Meet Piyush Mishra: A Poet & A Writer As Good As His Famous Namesake

Our veteran writer Ayena Makkar Girdhar caught up with पीयूष मिश्रा, one of the finest Hindi writers on YourQuote, who’s famous for his short poems and trivenis. Piyush, in this candid interview, reveals his life story & also mentions the perks of having a famous name. Read & enjoy.

Piyush Mishra

Q1. अपने बारे में हमें कुछ बताएँ. ऐसे सोचें जैसे आप अपनी संक्षिप्त जीवनी लिख रहे हैं।

पटना, बिहार में जन्मा. वहाँ कॉमर्स से ग्रेजुएशन के बाद पुणे से एमबीए किया, कुछ साल दिल्ली में भटका, अभी मुंबई में रहता हूँ, टीवी के लिए स्क्रिप्ट्स लिखता हूँ, ज़्यादातर प्रोमो का काम किया है. पढना, गाने सुनना, फिल्में देखना पसंद है. टीवी शायद ही कभी देखता हूँ. पॉलिटिकल, स्पिरिचुअल, माइथोलॉजिकल और रोमांटिक किताबें पढना पसंद है. स्ट्रीट फ़ूड जैसे गोलगप्पे, समोसे, सड़क किनारे मिलने वाला डोसा इत्यादि खाना बहुत पसंद है. वैसे तो बोलने से ज्यादा सुनना पसंद करता हूँ, लेकिन बोलने की बारी आये तो लम्बा बोल सकता हूँ. जो भी बात होती है सामने ही बोलता हूँ और साफ़ कहता हूँ, लोग कहते हैं इस से दुश्मन बढ़ते हैं, ऐसा मेरे साथ आज तक नहीं हुआ. शायद अच्छे दोस्त मिले हैं. वैसे तो मैं शॉर्ट टेम्पर्ड हूँ लेकिन मुझे नहीं पता क्यूँ पर कई दोस्तों ने मुझसे कई बार ये पूछा है- “ तुम गालियाँ भी देते हो?” शायद ये मुझसे सबसे अधिक पूछा गया सवाल है. एक मजेदार किस्सा बताता हूँ. मैं एक चैनल में काम करता था, तब मेरे एक साथी ने बॉस से मेरी शिकायत कर दी कि मैंने उसे गाली दी है. अब टीवी चैनल्स ऐसी जगह हैं जहां गालियों में ही बातचीत होती है और ऐसा करना कोई बड़ी बात नहीं है. मगर ऐसे में भी बॉस किसी भी तरह ये बात मानने को तैयार ही नहीं हुआ कि मैंने ऐसा कुछ कहा होगा और तब ही माना जब मैंने खुद ही कहा कि मैंने ऐसा कहा है. और उसका सवाल था “ तू गाली भीं देता है?” खैर! इस से तो यही कह सकते हैं कि इस दुनिया में इमेज ही सबकुछ है, तो अच्छा होगा मैं इस से ज्यादा कुछ ना कहूं, नहीं तो इमेज खराब हो जाएगी ;)

Q2: आपने लिखने की शुरुआत कब और कैसे की?

याद नहीं है. ये ज़रूर याद है कि घर में हमेशा से पढने-लिखने का माहौल था. नंदन, चम्पक, चंदामामा जैसी किताबें पढ़ते हुए बड़ा हुआ हूँ, थोड़ी ज्यादा समझदारी होने पर कादम्बिनी पढने लगा. पटना में ‘जनसत्ता’ अखबार एक दिन देर से मिलता था लेकिन सिर्फ इसलिए हमारे घर मंगाया जाता था क्यूंकि उसकी भाषा बहुत अच्छी थी, तब उसके सम्पादक प्रभाष जोशी हुआ करते थे.

पिताजी ने एक नियम बना रखा था- शाम सात बजे पढ़ाई करते हुए दिखने चाहिए. क्या पढ़ रहे हो इस से मतलब नहीं है. कहानी ही पढो मगर पढो. और हाँ! स्कूल का रिजल्ट भी अच्छा आना चाहिए. मुझे भी आदत थी, नयी क्लास में जाओ तो नयी आयी हिंदी की किताब को एक ही दिन में ख़त्म कर जाओ. बड़े भाई की भी हिंदी की किताब पढ़ जाता था.

इसके अलावा घर का माहौल कुछ ऐसा था कि किसी भी बात पर बातचीत की जा सकती थी. बहस की गुंजाइश हमेशा रखी गयी. इन सब माहौल का ही असर हुआ शायद कि पढ़ते-पढ़ते लिखने भी लगा, कब… ये बताना मुश्किल है.

3. आपको ज़्यादातर लिखने की प्रेरणा कहाँ से मिलती है?

लोगों को पढ़ कर. बच्चन, गुलज़ार, जावेद अख्तर, ओशो इन सब को पढना अच्छा लगता है. वैसे भी आदत ही है कि कागज़ का कोई छोटा सा टुकड़ा भी हाथ लग जाए तो पहले देखता हूँ उस पर लिखा क्या है. मेरा ऐसा मानना है अच्छा लिखने के लिए पढना बहुत ज़रूरी है. हम सौ लाइन्स पढेंगे तो एक लाइन लिख पायेंगे और ऐसी सौ लाइन्स लिखेंगे तो एक अच्छी लाइन होगी.

4. Television industry में काम करना कैसा रहा है आपके लिए?

अच्छा ही रहा है. ज़्यादातर प्रोमो का काम किया है तो एक चीज़ जो सीखी वो ये कि कम शब्दों में ज्यादा बात कैसे कही जाए. कोई बहुत अच्छा प्रोमो हुआ तो ज्यदा से ज्यादा तीस सेकंड का टाइम होता है जिसमें डायलाग के लिए बारह तेरह सेकंड से ज्यादा नहीं मिलता. ऐसे भी प्रोमो आ जाते हैं जब कहा जाता है ‘हमारे पास दो सेकंड हैं डायलाग के लिए.’ दूसरी बात ये सीखने को मिली कि कागज़ पर ऐसे कैसे लिखा जाए कि पढने वाले की आँखों के आगे सारा सीन आ जाए. कई बार तो कैमरा एंगल से लाइट और म्यूजिक तक का ज़िक्र करना पड़ता है.

एक बात और है. ये इंडस्ट्री आपको खोखला बनाती है. बने-बनाए ढर्रे पर चलती है, आपको कुछ नया करने का मौका ही नहीं मिलता. साहित्य नदारद है. हिंदी जानने वाले लोग भी कम हैं. ऐसे मौके अक्सर आते हैं जब कहा जाता है ‘कोई नया शब्द लिखो यार! कुछ नया गढ़ दो, जैसे कि पागलपंथी’ और जैसे ही आप कुछ नया लिखते हैं तो जवाब आता है-“ यार! ये कोई समझ पायेगा क्या”

5. लिखने में आपको ज़्यादा क्या पसंद है- लेख, कविताएं शेर-ओ-शायरी?

कवितायें.

6: कभी किताब लिखने का सोचा है आपने?

नहीं. अभी वो समय नहीं आया कि मैं किताब छपवाऊं. बहुत कच्चा हूँ लिखने में. अभी बहुत सीखना बाकी है. अभी तो बहुत सारी किताबें पढना ही बाकी है, लिखने का सोचना भी बेकार है.

7. क्या आपको पढ़ने का भी शौक़ है? ज़्यादा क्या पढ़ना पसंद करते हैं?

लिखने से ज्यादा पढने का ही शौक़ है.कवितायें पढना पसंद हैं. व्यंग्य पढना भी पसंद है. बच्चन, गुलज़ार, जावेद अख्तर, निदा फाजली, ओशो, Paulo Coelho , ‎Khaled Hosseini, परसाई, शरद जोशी ये सब बहुत पसंद हैं. कुछ नए लोग अच्छा लिखते हैं जैसे सत्य व्यास, स्वप्निल तिवारी, गिरीन्द्रनाथ झा, त्रिपुरारी… और भी लोग हैं. (ज्यादा नाम लूँगा तो लोग कहेंगे अपने दोस्तों को प्रमोट कर रहा हूँ). जिन्हें सस्ते नावेल कहा जाता है वैसी वाली किताबें पढना बहुत अच्छा लगता है- वर्दी वाला गुंडा, इब्न-ए-शफी की किताबें टाइप. रामायण, महाभारत, गीता इत्यादि पर लिखी गयी अलग-अलग किताबें पढना पसंद है. पोलिटिकल आर्टिकल्स बहुत पढता हूँ.

8. ‘पियूष मिश्रा’ नाम से आपके लेखन पर क्या प्रभाव पड़ा है? कभी इस नाम का बोझ लगा है क्यूंकि वह तो इतने नामचीन हैं।

लिखने पर तो कुछ ख़ास असर नहीं हुआ है, वो थिएटर के बड़े आर्टिस्ट हैं, उनकी लेखनी में बहुत धार है. पढने वालों को कन्फ्यूज़न होती हो तो पता नहीं. फेसबुक पर फ्रेंड रिक्वेस्ट ज़रूर आते रहते हैं इस नाम की वजह से. ई-मेल भी आते रहते हैं जिसमें लोग पूछते हैं आप मकबूल वाले पीयूष हैं?

मुझे कभी इस से बोझ महसूस नहीं हुआ, बल्कि मैं तो अपने दोस्तों को कहता हूँ अपनी किताब की भूमिका मुझसे लिखवा लो. खरीदने वालों पर नाम का असर पड़ेगा. ‘अश्वत्थामा मारा गया’ जैसा झूठ/ सच होगा ये, कोई पाप भी नहीं लगेगा. एक बार यूँ हुआ मैंने एक प्रोडूसर को काम के लिए फ़ोन किया. उस बन्दे का नाम था -राहुल बोस. जब मैंने कहा मैं “पीयूष मिश्रा” बोल रहा हूँ तो वो चौंक गया बोला “ आपने मुझे फ़ोन किया?” तब मैंने कहा “ भाई जैसे तुम राहुल बोस हो मैं वैसा वाला पीयूष मिश्रा हूँ”

9. YourQuote के बारे में क्या कहना चाहेंगे?

एक बात है कि हमारे यहाँ लोगों को लिखने=पढने का शौक़ बहुत ज्यादा है. पहले-पहल ऑरकुट आया. लोग कम्युनिटी बना कर कवितायें, कहानियां लिखते थे. फिर फेसबुक का क्रेज हो गया. आप देखिये हर दूसरा बंदा कवि है यहाँ. YourQuote ऐसे सभी लेखकों कवियों के लिए बहुत ही अच्छा प्लेटफार्म है. मैंने App के FB ग्रुप पर ऐसा लिखा हुआ पढ़ा है कि यहाँ कोई भी कुछ भी लिख रहा है. क्वालिटी खराब हो रही है और ऐसी ही कितनी ही बातें. ये सब बेकार की चिंताएं हैं. आप देखिये बाज़ार में रोज़ दस किताबें आती हैं. किताबों का मेला लगा है. लेकिन उनमें से ही हम कूड़ा छांटते जाते हैं और अच्छी किताबें निकाल कर पढ़ भी लेते हैं. ये App भी ऐसे ही बाज़ार जैसा है. यहाँ फॉलो करने का आप्शन है. आपको जिसका लिखा पसंद नहीं आता फॉलो मत कीजिये. मगर इस तरह के app का फायदा लिखने वालों को ज्यादा है. जब लोग आपकी तारीफ़ करते हैं, कई बार कुछ सजेशन्स भी देते हैं तो आप और अच्छा लिखना चाहते हैं, ज़ाहिर है ऐसा करने के लिए बंदा और पढता है, लोगों को सुनता है. तो ऐसा कह सकते हैं कि अच्छे लेखकों को बढ़ावा देने में यह बहुत सहयोगी है.

10. YourQuote पे सबसे पसंदीदा लेखक कौन है आपके?

मैंने और लोगों के interviews पढ़े हैं और देखा है लोग नाम लेने से कतराते हैं. कुछ तो कहते हैं सब अपनी जगह अच्छे हैं, जबकि सब अच्छे हों ऐसा हो नहीं सकता. मैंने पहले ही कहा है मुझे पॉलिटिक्स पसंद है, इसलिए मैं तो नाम लूँगा. हर्ष, दर्पण साह और सौरभ. ये तीन लोग बहुत अच्छा लिखते हैं. और भी होंगे पर जितना मैंने फॉलो किया है उनमें यही तीन अच्छे लगते हैं. इनके लिखने में बहुत साफगोई है.

11. अपने लिखने के अंदाज़ में, अगर कुछ बदलने चाहें तो वह क्या है?

उर्दू शायरी सीखना चाहूँगा. मेरे बहुत से दोस्त शायर हैं जो बिलकुल शायरी के नियम से लिखते हैं और नए शायरों में अपना नाम बनाया है. ये मेरी बदकिस्मती या कहिये आलसपन है कि मैंने उनसे उर्दू शायरी के नियम नहीं सीखे.

12. अगर आपकी ज़िंदगी पर आधारित किताब या कविता लिखनी हो, तो उसका शीर्षक क्या होगा?

ये तो किताब लिखने वाला ही बता सकता है, क्यूंकि कोई ऐसा पागल क्यूँ होगा कि मुझ पर किताब लिखना चाहे? कोई पुरानी गर्लफ्रेंड हो तो बात अलग है, वो किताब का नाम ‘ पर्दाफ़ाश’ या ‘गन्दी बात’,रख सकती है.

13. जैसा कि आपने कहा आप एक शहर में टिक नहीं पाते, तो यह बंजारापन क्यों?

ऊब जाता हूँ और ये सिर्फ शहरों के साथ नहीं है, ये हर उस चीज़ के साथ है जो मेरी ज़िन्दगी में है. लगता है ये तो हो गया अब कुछ और करते/ देखते हैं.

14: आपकी पसंदीदा कविता या कोई पंक्तियाँ?

एक बताना बहुत मुश्किल है और सारी बताऊंगा तो पन्ने भर जायेंगे.

15: कोई एक चीज़ जो दिल के सबसे ज़्यादा करीब हो, उसके बारे में बताएं?

चीज़ तो ऐसी कोई नहीं है, कारण तो पहले ही बताया- ऊब जाता हूँ. हाँ, मेरे पिताजी, दो साल पहले देहांत हो गया उनका. अचानक ही जैसे मैं बड़ा हो गया. उनके आखिरी समय में अस्पताल में उनके साथ सिर्फ मैं था. वो मंज़र मेरी आँखों के सामने से एक मिनट के लिए भी नहीं जाता. वो जहां भी होंगे मुझे देख रहे होंगे, और मेरी छोटी-छोटी सफलताओं पर खुश भी होते होंगे.

Here are some of best quotes by Piyush Mishra:

To get interviewed, read this: https://www.quora.com/How-do-I-get-featured-on-YourQuote-interview