Meet Bhawana Poonam Awasthi: A Sea of Emotions

तल्ख़ साहिबा योरकोट परिवार में हिंदी और उर्दू रचनाओं के लिये अपनी पहचान बना चुकी हैं। इस कलम के पीछे छुपे व्यक्तित्व को जानने और समझने का एक छोटा सा प्रयास किया है हमारे लेखक अनुभव बाजपेयी ‘चश्म’ ने।

Bhawana Poonam Awasthi

नमस्ते ! तल्ख़ साहिबा ,सबसे पहले तो बहुत शुक्रिया आपका साक्षात्कार के लिए अपना अमूल्य समय देने के लिये। तो शुरू करते हैं आपके परिचय से ताकि लोग आपको जान सकें ।

नमस्ते चश्म साहब! सर्वप्रथम तो आभार व्यक्त करती हूँ समस्त योरकोट परिवारका मुझे इतने अच्छे व्यक्तित्वों के सम्पर्क में लाने हेतु।अब कश्मकश ये है कि परिचय दिया किसका जाए?तल्ख़साहिबा का या भावना अवस्थीका…ख़ैर!!भावना अवस्थी का ही दे देती हूँ,तल्ख़साहिबा को तो आप योरकोट पर जानते ही रहते हैं। 12 जुलाई 1994 , दिन मंगलवार को माँ को असह्नीय पीड़ा पहुंचाकर जन्म लिया रायबरेली जिले के लालगंज कस्बे में और दुःख है कि यह कर्ज सभी पर आजीवन कर्ज ही रहता है।बाबा- सेवानिवृत्तअध्यापक,माँ-गृहणी, पापा-व्यवसायी, एक छोटा भाई और बहन, चाचा,चाची और उनकी बेटियाँ….यही है हमारा संयुक्तपरिवार।पढ़ाई-लिखाई भी वहीं के विद्यालय ‘सरस्वतीशिशु मंदिर’ से हुयी फिर पापा ने उदयपुर (राजस्थान) में कई वर्ष काम किया तो हमें भी चार वर्ष वहां व्यतीत करने का अवसर प्राप्त हुआ और वो चार वर्ष का समय मेरे अभी तक के जीवन का सबसे खुशहाल समय था।पिता जी की कुछ स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण हमें वह खूबसूरत शहर छोड़कर वापस घर आना पड़ा और फिर मेरा वही पुराना विद्यालय और वही याराना, पर चूँकि अब शिशु नहीं रही थी तो विद्यालय भी सरस्वती विद्या मंदिर हो गया था। पढ़ाई के प्रति रुचि बचपन से ही थी तो कक्षा में अधिकतर अव्वल रहना भी खुशी देता था, मुझे भी और परिवारजनों को भी।इसके अतिरिक्त विज्ञान वर्ग की इस विद्यार्थी को संगीत और कला में भी रुचि थी।बचपन से ही लगभग सभी अध्यापकों की गुड बुक्स में नाम रहा है और यह मैं अपनी उपलब्धि समझती हूँ (विनम्रता से)।तत्पश्चात लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातक (विज्ञानवर्ग) करके दो वर्षीय बी.टी.सी. की ट्रेनिंग अभी अक्टूबर, 2017 में पूर्ण की है और फिलहाल एक निजी संस्था में शिक्षिका की भूमिका का निर्वाह कर रही हूँ।अभी इससे अधिक और कुछ बताने के लिए है नहीं!

आपकी यादों में कहीं न कहीं अब भी उदयपुर जरुर बसा हुआ है मौका मिले तो शायद आप वहीं बस जाएँ । वैसे आपने शिक्षण की और रुख कैसे किया और विज्ञान वर्ग का विद्यार्थी होते हुए भी कला और संगीत के प्रति कैसे रुझान हुआ ?

उदयपुर का तो यूँ है कि –“तेरे दिल का मेरे दिल से रिश्ता पुराना है”, तो अगर भविष्य में मौका मिला तो निश्चित ही मैं वहां बस जाना चाहूँगी और तो और प्रयासरत भी रहती हूँ (हल्की सी मुस्कान सहित)।

शिक्षण की ओर रुख करने की कोई खास वजह नहीं है, एकमात्र ‘किक’ वाला हिसाब-किताब है कि बस जो है मेरे पास, जितना भी है, थोड़ा या ज्यादा….अगर किसी को भी दे पाती हूँ तो मन को सुकून मिलता है। फिर मेरे जीवन के सबसे बहुमूल्य प्रेरणास्रोत मेरे बाबा भी अध्यापक थे और वो हमेशा मुझे पढ़ाते समय एक बात कहते थे कि जो तुमने पढ़ा है उसे किसी और को पढ़ा देना तो तुम्हें भी आसानी से याद हो जाएगा। बस यही बात मैं याद रखती थी और प्रैक्टिकल भी किया करती थी। वहीं से पढ़ाना शौक हुआ फिर आदत और अब सुकून। पढ़ाना मेरे लिए इबादत जैसा है, जिसमें किसी नकारात्मकता के लिए कोई स्थान नहीं है। हालाँकि मेरा लक्ष्य शिक्षा विभाग में और अधिक अग्रसर होने का है और उस पर भी काम कर रही हूँ, सफलता की उम्मीद में।

रही बात संगीत और कला की तो बचपन से ही बड़ा शौक रहता था, लड़की हूँ इसलिए शायद। विद्यालय में भी हर कार्यक्रम में भाग लेना फिर चाहे वो नृत्य हो या गायन। इसके अलावा तरह तरह की प्रतियोगिताएँ होती रहती थी तो उन सब में भाग लेना और जीतने की ललक में बेजोड़ कोशिश करते रहना अच्छा लगता था….खुशी मिलती थी। हिंदी सुलेख, अंग्रेजी सुलेख, भाषण, खेल-कूद, मेंहदी प्रतियोगिता और न जाने क्या क्या….इन सभी में जीते हुए हर एक पुरस्कार का श्रेय मैं अपनी माँ को देना चाहूँगी क्योंकि उनके प्रोत्साहन के बिना यह कदाचित संभव न होता। कई बार जब सब डाँट दिया करते थे कि पढ़ने का समय इन सब में लगाना ठीक नहीं!, तो माँ ही समर्थन देती थी और लड़ जाती थी सबसे कि विकास हर दिशामें होना जरूरी है, करने दीजिए जो कर रही है (यहाँ विकास मोदी जी वाला नहीं है)।यही वजह भी है शायद कि आज मैं स्वयं को आप सबके सामने रखने में सक्षम हूँ। एक बात और जो मुझे खुशी देती है,हालाँकि कभी कह नहीं पायी तो यहाँ बता देती हूँ कि भले ही डाँट कितनी भी खायी हो पर वो सारे मेडल्स और पुरस्कार बाबा ने अपने कमरे की अलमारी में रखवा रखे हैं और ये मेरा सर्वोत्तम पुरस्कार है।

मेरी शुभकामनायें हैं कि आपको आगे भी अध्यापन में सफलता और सुकून मिलता रहे। शायद आप अपने बाबा और मम्मी के ज्यादा करीब हैं। वैसे लेखन की शुरुआत कैसे हुई और आपका लहजा भी एकदम आपकी ही तरह तल्ख़ है ये तल्ख़ नाम से लिखने को आपको सूझा कैसे ?

चश्म जी को धन्यवाद ज्ञापित हो ! जी हाँ….बिल्कुल सही समझा आपने कि बाबा और माँ के मैं बेहद करीब हूँ या फिर गणितीय तौर पर ऐसे समझाऊँ कि यदि ‘हौसला’ शब्द को तोड़कर तीन अक्षरों एवं दो मात्राओं में विभाजित किया जाए तो डेढ़ अक्षर और एक मात्रा के समानुपात में इसे मैं बाबा और माँ में बाँट दूँ, लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि पापा के करीब नहीं हूँ।यदि नींव हैं बाबा तो पापा ही तो है स्तम्भ हमारी इमारत के। उन्होंने भी मेरे हर लड़खड़ाते कदम को सहारा दिया है और घर की बड़ी और समझदार ( यह वहम मात्र है उनका….खिलखिलाते हुए) बेटी होने के नाते कहीं न कहीं मैं भी उनके मन में बहते भावों की गंगा को समझती हूँ और यह वो भी समझते हैं।

लेखन की शुरुआत की कहानी तो काफी लम्बी है और मैं आप सबको उबासियाँ लेते देखना बिल्कुल नहीं चाहती इसलिए संक्षेप में बताती हूँ। विश्वविद्यालय से स्नातक करते हुए छात्रावास में मेरी रूम मेट (मेरा पहला प्यार और सबसे अच्छी सहेली…… याराना वाला) कात्यायनी तिवारी को लिखने का बड़ा शौक था और साथ ही उसकी रचनाएँ पढ़ने का। उसे पढ़कर मन ही मन कुढ़ती थी कि काश! कभी मैं भी कुछ लिख पाऊं, भले ही एक पंक्ति क्यों न हो लेकिन मेरी यह अभिलाषा, अभिलाषा ही रही क्योंकि मुझे लगता था कि लेखन मेरे लिए है ही नहीं। बात भूली बिसरी होती गई और फिर एक और अजीज़ मित्र शिव (शिवेंद्र सिंह) को पढ़ना शुरू किया तो अभिलाषा पुनः जागी मगर इस बार भी कुछ हासिल न हुआ। काफी समय बाद परीक्षित कौशल जी से योर कोट एप्लीकेशन के बारे में पता चला, जहाँ पर शिव पहले से ही मौजूद थे मगर कभी ज़िक्र नहीं किया था, तो मैंने भी कर ही लिया डाउनलोड और इन्सटाॅल…….पिन्नू से साइज का ऐप था तो डेटा भी खर्च नहीं हुआ ज्यादा। पहला कोट लिखा अंग्रेजी में- Love, Poison and Antidote से रिलेट करके…..लोगों ने प्रोत्साहित किया तो दाढ़ी वाले बाबा जी के चैलेंज पर लिखती रही….फिर और भी तरह तरह के चैलेंज आते थे और मैं पूरा करती थी…लोग तारीफ करते थे और मैं खुश होकर thanks a lot from bottom of my heart बोल देती थी। 14 सितंबर 2017 मेरे लिए आजीवन खास रहेगा क्योंकि वहां से मैंने असल मायने में समझा कि लिखना क्या है और वह भी तब समझ आया जब दिनकर जी की कविता से प्रेरित होकर हिंदी दिवस पर हिंदी का जयघोष किया। बस फिर रुझान हुआ हिंदी की तरफ और योरकोट पर ही हिंदी लेखकों को पढ़ना शुरू किया और सीखती गयी, अब भी सीख ही रही हूँ।

यह तो हुई लेखन की कहानी, अब तल्ख़ियत भी यहीं की देन है। पढ़ते पढ़ते पहुंची एक दिन अनिल अमेटा सर की प्रोफाइल पर और यकीन मानिए जितना पढ़ रही थी उतना ही और मन कर रहा था डूब कर बह जाने का…..! वक्त लगा मुझे यह स्वीकारने में कि वह ही हैं मेरे प्रेरणास्रोत सही मायने में….और शायद उन्हें भी लगा था। वहां शुरू हुआ सिससिला दो पंक्तियों में व्यंग्य लिखने का और उनके प्रोत्साहन भरे शब्दों से मुझमें ऊर्जा संचार का।हौसलाअफ़जाई उनसे बेहतर कोई नहीं कर सकता….हौसलाअफ़जाई ही क्यों….मेरे लिए तो उनसे बेहतर कुछ हो ही नहीं सकता। अशेष धन्यवाद योरकोट का, मुझ एकलव्य को द्रोणाचार्य देने के लिए। यह तो सब जानते है कि व्यंग्य कभी मीठे नहीं होते इसलिए मैंने स्वयं को ‘तल्ख़’ कहना उचित समझा। जब कोलैबोरेशन की दौड़ शुरू हुयी तो उसमें बहुत कम हिस्सा लिया मग़र तख़ल्लुस के दौर में अवस्थी जी (आशीष अवस्थी) और आशुतोष तिवारी जी के तख़ल्लुस ने मुझे भी उकसा दिया था तो मैं भी शामिल हो गयी इस वाली दौड़ में। बस इतनी ही है कहानी…..बड़ी तो ज़रा भी नहीं है…है न चश्म साहब!

हाहा, बहुत ज्यादा छोटी है तल्ख़ साहिबा । दिनकर जी को पढना तो अपने आप में सौभाग्य ही है रोंगटे खड़े हो जाते हैं उनको पढकर । अब बात योरकोट के लेखकों की उठी है तो आपके कुछ पसंदीदा लेखकों, जिन्हें आप योरकोट पर पढना बेहद पसंद करती हों ,के बारे में पूछना तो बनता ही है।

बिल्कुल सही! शक्ति और क्षमा, समर शेष है ये रचनाएँ मुझे प्रिय हैं दिनकरजी की और ‘कलम या तलवार’ इस रचना को जितनी बार पढ़ती हूँ, नया आयाम और साहस मिलता है लिखने का। योरकोट के पसंदीदा लेखकों के बारे में पूछकर तो आपने वही बात कर दी कि कड़कड़ाती ठंड में पूछ रहे हैं कि चाय पिलादूँ या आग जला दूँ।कहने का तात्पर्य यह कि सबकी लेखनी की अपनी एक महत्ता है,विधा है और स्तर भी तो उसमें से तय कर पाना काफी मुश्किल है,लेकिन अब सवाल हुआ है तो जवाबदेही भी करनी ही होगी।

सर्वप्रथम अनिल आमेटा सर (प्रेरणास्रोत) को मेरी लेखनी समर्पित हो। तत्पश्चातजो अन्यलोग हैं जिन्हें पढ़कर बहुत कुछ सीखने को मिलता है और पढ़कर खुशी मिलती है वो हैं- शिवेन्द्र सिंह, आशीष अवस्थी जी, आशुतोष तिवारी जी,सुनीता सिन्हा जी,प्रीति कर्न जी,पूनम अर्चना सिंह जी,हर्षिता पंचारिया जी,जय कुमार जी,अभिलेख जी,मयंक तिवारी जी, प्रियंका मुथरेजा जी,तनु श्रीवास्तव जी, अपर्णा गुप्ता पालीवाल जी, संदीप व्यास जी,अंश राजौरा जी,सिद्धार्थ दधीच जी, इप्सिता साहू,एम डी, स्वतंत्र कुमार सिंह, विकास सिंह राजपूत जी,अनन्य सिद्धराज, अभिषेक मिश्राजी, निक्की महर जी, पवन कुमार लादिया जी,संजय कनौजिया जी,अविनाश कुमार जी,अंजुला भदौरिया जी,रचिता पट्टनायिक जी,अंकिता शाही,रमनदीप सिंह सेहगल जी,अनुपमाझा जी,और गद्य रचना के महारथी अनुभव बाजपेयी चश्म ……और भी बहुतलोग हैं जिनसे जुड़ना और पढ़ना अभी भी बाकी है।

अब जब बात दिनकर जी की हुई ही है तो बात करते हैं उन मूर्धन्य रचनाकारों की जिनको पढ़कर आप लिखने के लिए प्रेरित होती हैं या जिन्हें पढ़ना आप पसन्द करती हैं।

हा हा…..लगता है आज घोड़ों की रफ्तार थोड़ी ज्यादा हैं मेरे। लगा ही था मुझे कि अगला प्रश्न कुछ ऐसा ही होने वाला है, ख़ैर मैं थोड़ा सकुचाई हुई थी इस सवाल से क्योंकि सच तो ये है कि बारहवीं कक्षा की गद्य और काव्य संकलन की किताब के बाद कभी हिंदी साहित्य पढ़ने की ओर रुख ही नहीं किया लेकिन जब तक पढ़ा था रम कर पढ़ा था। फिर The Alchemist और Heart of Darkness जैसे कुछ ही उपन्यास पढ़े थे मग़र जब ललक और रुझान हुआ हिंदी लिखने की तरफ तो पढ़ना शुरू किया और पढ़ा दिनकर जी को, ज़िक्र कर ही चुकी हूँ….. जयशंकर प्रसाद जी को जिसमें ‘मेरी आँखों की पुतली’ बहुत पसंद आयी थी…और सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ जी को जिनकी परिमल बेहद करीब लगी थी….मौन, तुम और मैं, भिक्षुक, और बादल… आहा! क्या बुनाई है, कोई सूक्ष्मता छोड़ी ही नहीं गयी लिखने को। जारी है सिलसिला पढ़ने का क्योंकि अब प्रेम हो गया है हिंदी से और आप भी तो कहते हैं खूब पढ़िए तो बस वही अनुसरण करने का प्रयास है। फिलहाल आजकल ‘गुनाहों का देवता’ भारती जी के उपन्यास को समय दे रही हूँ। मैं साझा भी करना चाहूँगी निराला जी की एक बुनाई ‘आध्यात्म फल’, पढ़िएगा

जब कड़ी मारें पड़ीं, दिल हिल गया

पर न कर चूँ भी, कभी पाया यहाँ;

मुक्ति की तब युक्ति से मिल खिल गया

भाव, जिसका चाव है छाया यहाँ।

खेत में पड़ भाव की जड़ गड़ गयी,

धीर ने दुख-नीर से सींचा सदा,

सफलता की थी लता आशामयी,

झूलते थे फूल-भावी सम्पदा।

दीन का तो हीन ही यह वक्त है,

रंग करता भंग जो सुख-संग का

भेद कर छेद पाता रक्त है

राज के सुख-साज-सौरभ-अंग का।

काल की ही चाल से मुरझा गये

फूल, हूले शूल जो दुख मूल में

एक ही फल, किन्तु हम बल पा गये;

प्राण है वह, त्राण सिन्धु अकूल में।

मिष्ट है, पर इष्ट उनका है नहीं

शिष्ट पर न अभीष्ट जिनका नेक है,

स्वाद का अपवाद कर भरते मही,

पर सरस वह नीति — रस का एक है।

निरालाजी भी क्या-क्या लिख देते हैं उनकी लेखनी अमर है और गुनाहों का देवता तो कालजयी उपन्यास है भारती जी का ,शायद ही कोई हो जो पढ़कर चन्दर औ रसुधा को भूल पाया हो।जितना मैंने जाना आपको अभी तक आप एकदम फक्कड़ मिजाज़ लगी मुझे सीधा ,सटीक कमशब्दों में बहुत कुछ कह देना आपकी कला है।तो अपनी लेखनी के लिए आप भाव ,सम्भावनाएं और कहानियां कहाँ से चुराती हैं?

अरे वाह! आपसे इसी समझदारी की उम्मीद भी थी मुझे (हा हा)..मैं भी प्रयास में हूँ कि शीघ्र ही पढ़ डालूँ इसे। .हाँ काफी हद तक आपकी बात सच है कि मुझे सीधा बोल देना बेहद पसंद है, जो कुछ भी है मन में और कई बार यह घातक भी साबित होता हैमेरे लिए और जैसे मधुमक्खी के काटने से मुँह फूलता है न, वही हस्र हो जाता है लोगों का भी….पर मरहम में शहद भी रखती हूँ।पर इसके अतिरिक्त एक घोर सत्य यह भी है कि मैं निरा अंतर्मुखी भी हूँ, वह भावना जो सबको दिखती है असल में तो शायद वो है ही नहीं। अब आप भावना से पूछ रहे हैं कि भाव कहाँ से आते हैं? वो तो कूट-कूट कर भरे हैं मुझमें और इतने ज्यादा कि मैं खुद भी परेशान हो जाती हूँ कभी कभी खुद से और लिखने के लिए तो साहब ऐसा है कि कोई शब्द या पंक्ति या किसी से वार्ता करते हुए बातों से बातें निकल आती हैं और फिर जब तक उस पर अपने मनोभाव और शब्द-संयोजन की परतें न चढ़ा लूँ, दिलो दिमाग अटका रहता है तब तक वहीं। लिखने के लिए मुझे एकांत की नहीं वरन् मनन और विचार- मंथन की निरंतरता चाहिए होती है और उस राह से तब तक नहीं भटकती जब तक कुछ उतर न आए पन्नों पर और जब खयाल आते हैं न, तो मुझे तनिक भी वक्त नहीं लगता उनकी तब्दीली में, कोई सरकारी काम थोड़े ही है जो घिसट घिसट कर चलता रहे ( no offence पिलीज़)।

मैं कोई चोर वोर नहीं हूँ….!! पूरा इरादा लगता है आपका मुझे फंसाने का (अठखेली ही समझिएगा)!बस कभी-कभी दिल और दिमाग के घोड़ों को दौड़ लगवाती हूँ जानबूझकर तो कभी अनजाने मेंऔर कुछ मनोदशा, व्यथा, प्रेम और भी बहुत कुछ निकल ही आता है।पर हाँ! वास्तविक जीवन के उदाहरण अवश्य ही मददगार साबित होते है अक्सर। एक और सत्य यह कि-

“मैं कहाँ लिखती हूँ कुछ भी, कलम मुझे लिख डालती है।“

एकदम सोलह आने सच हम सबको लेखनी ही लिखती है ।अच्छा कभी कोई किताब या कोई रचना पढ़कर लगा हो कि काश मैंने ये लिखी होती या कभी ईर्ष्या हुई हो किसी रचनाकार की किसी रचना कि ये मैंने क्यों नहीं लिखी?

अरे पूछिए ही मत! जब भी कभी कुछ बहुत अच्छा पढ़ लेती हूँ तो आग लग जाती है और आप हैं कि ईर्ष्या की बात कर रहे हैं। कबीर, सूर, तुलसी, प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान, निराला जी, बंकिम चंद्र चैटर्जी और तमाम लेखकों और कवियों की आत्मा भी मुझ में समा जाए तो भी संतुष्टि नहीं मिलेगी। जब प्रेम हुआ है लिखने से तो लालच भी हिलोरे मारता है और लगातार बढ़ता हुआ शेयर जैसा लगता है….वैल्यू जितनी बढ़े उतना ही और चाहिए और घटने का तो कम्बख़्त नाम लेना ही नहीं चाहता। दिन प्रतिदिन प्रकाश के वेग सा बढ़ता जाता है। ख़ैर…..अब थोड़ा सीरियस हो जाया जाए। मुझे कान्हा जी बेहद प्रिय हैं तो यह लगता है कभी कभी कि काश! मैं उनकी बाल लीलाओं को साक्षात देख पाती और यथासामर्थ्य मनमोहन चित्रण कर पाती अपने शब्दों से। हाँ!….योरकोट पर निक्की महर मैम का गालिब को लिखा हुआ खतव ‘शेल्फ किताब और एक ख़्वाब’,आशीष अवस्थी जी की ‘कन्हैया’ व ‘‘कर्मयोगी’, आशुतोष तिवारी जी की ‘मन का मन से परिणय’ व ‘शज़र’’ और अनिल अमेटा सर की ‘कुंठा’, इन रचनाओं को पढ़कर लगता है कि मैं भी कभी ऐसा कुछ लिख पाऊं।

सब एक से बढ़कर एक हैं वैसे थोड़ा लालच बना भी रहना चाहिए नही तो लेखक नीरस हो जाता है। अच्छा आपके लिए लेखन क्या है और आप सबसे महत्व किस बात को देती हैं लेखन में?

दुरुस्त फ़रमाया आपने….! लेखन को न जाने कितने ही कवियों व लेखकों ने परिभाषित किया है या यूँ कहिए कि अपना मत व्यक्त किया है और मैं तो स्वयं को इस लायक ही नहीं समझती कि इस प्रश्न का उत्तर दे सकूँ! वैसे यह छोटा मुँह और बड़ी बात है पर मुंह साफ करना किसे अच्छा नहीं लगता! तो मेरा मत ये है कि लेखनप्रेमहै और प्रेम सदैव ही अपरिभाषित था, है और अनंतकाल तक रहेगा। भावनाओं का विशुद्धरूप जब शब्दों से प्रस्फुटित हो….वही लेखन हो जाता है।

सृजन भी प्रसव प्रक्रिया की ही तरह लगता है मुझे, यदि प्रसव पीड़ा सहन कर शिशु को जन्म दिया जाए तो हर पहलू में सकारात्मक परिणाम होते हैं और यह मैंने स्वयं भी महसूस किया है कि कष्ट सह कर सृजन से आत्मसंतुष्टि मिलती है। रही बात महत्व की तो लेखन में मैं सदैव अपने नाम के अनुरूप भावना को आगे रखना चाहती हूँ और कोशिश भी बहुत रहती है कि भाव पाठकों तक पहुंचे लेकिन यहाँ भी मेरी एक कमी है कि यदा कदा रचना में ;शब्दों का भारीपनभाव को रौंद देता है और बाद में कष्ट भी होता है।

जी बिल्कुल लेखन प्रेम ही तो है और प्रेम भक्ति है अर्थात लेखन भक्तियुक्त प्रेम है । आप अपने आप में कमाल हैं पर कभी कोई बदलाव या नया कुछ जोड़ना हो आपको अपने लेखन में तो आप क्या जोड़ना चाहेंगी ?

वाह!जितनी गूढ़ता से महाशय आप लिखते हैं न, समझदार इशारा भी उतने ही करीने से करना जानते हैं एकदम।बच्चे ने अभी घुटनों पर भी चलना नहीं सीखा और आप उससे पूछ रहे हैं कि बेटा स्कूल में सब बरोबर समझ में आ रहा न, मैडम पढ़ाती तो हैं न ठीक से,कोई बच्चा परेशान तो नहीं करता ! कमाल करते हैं चश्म साहब! कुछ भी नहीं जानती अभी तो मैं, कतई नौसिखिया। फिर भी अगर बदलाव की कहें तो ये कि कठिन शब्दों से परहेज़ रखना चाहूँगी और जोड़ने में यह कि ‘विभिन्न विधाओं का ज्ञान’ समेटना चाहूँगी। अलग अलग किस्म की विधा और विषय पर हाथ साफ करना चाहूँगी और सीखने की सोचे और सीखने बैठें तो सारी उम्र गुज़र जानी है, लेकिन सिलसिला खत्म नहीं होगा।हर रोज ही कुछ न कुछ, कहीं न कहीं से मिल ही जाता है सीखने को।एक शे’र भी लिखा था इस पर….कुछऐसा था कि,

“बुझते चरागों को भी महताब-ए-उर्ज़ लाज़मी है,

बेइल्मी को मेरी अभी इल्म-ए-अर्ज़ लाज़मी है।“

वाह! क्या खूब कहा आपने। वैसे सीखना तो जीवन भर चलना ही चाहिए नही तो लेखक मरने लगता है। एक बात याद आयी कि आप अध्यापन का कार्य करती हैं तो क्या अध्यापन का आपके लेखन पर भी कोई प्रभाव पड़ता है?

न…न…न!दोनों का दूर दूर तक कोई संबंध ही नहीं है….न वैध और न ही अवैध क्योंकि विषय वस्तु वहां से आती ही नहीं कभी।अब जैसे कि मैंने कहा था कि हर विषय पर हाथ साफ करने का प्रयास किया जाएगा तो उस पक्ष से भविष्य में प्रभावित होने या न होने की 1 प्रतिशत भी निश्चित गारंटी नहीं है।मामला रिस्की है….गाड़ी उतर भी सकती है पटरी से…दुर्घटना की संभावना( हंसतेहुए)!

बहुत सही तिलिस्मी रहस्य ! अब बात करते हैं आपके जीवन के किसी एक दिलचस्प किस्से के बारे में जो आप हम सबसे साझा करना चाहें।

जी शुक्रिया…! तो बात कुछऐसी है कि किस्सा मतलब तो हो गया कि पैदा हुई….सबसे बड़ीथी तो सभी से असीम लाड़-प्यार…पढ़ाई-लिखाई…यार-दोस्त…थोड़ी बहुत मौज मस्ती…गुस्सातो नाक पर…सबसे दंगलकरने को हमेशा तैयार बशर्ते बात तुक की हो…अकेले रहना पसंद है इसलिए एकांत ढूंढती हूँ अक्सर…मिलना जुलना भी भाताहै तो महफिल में भी शरीक़ हो लिया करती हूँ….ऐसे ही करते कराते वक्त निकल रहा है।आगे कैसा होगा, क्या होगा, पता नहीं! ये सब तो हैंछोटे मोटे किस्से, जो सबके साथ होते ही हैं, कुछ नयापन नहीं है।अब हम ठहरे अवस्थी, तो किस्सों पर भरोसा कम है….कांड किए जायेंगे सीधा और जब कांड होंगे तो किसी और के अंगूठे में दर्द होगा….मेरा क्या है!( इन बातोंका वास्तविकता से कितना संबंध हैअथवा होगा,येतोआखिरी समय मेंहीपता लगेगा!)

बढ़िया है लगी रहिये फिर कांड का क्या है वो तो होते रहेंगे सीतापुर की चॉकलेट भी ले लीजिएगा । आप कांड करिए हम कांडी क्रश खेलेंगे। कांड से याद आया कि यौरकोट पर आने के बाद कोई बदलाव आया क्या आपके व्यक्तित्व और दिनचर्या में?

हा हा हा… साहब! आप भी तो चश्म जी हैं….छुपा कहाँ रह सकता है आपसे कुछ भी…..खेलते तो अक्सर ही रहते हैं आप…मशहूर भी हैं।

.व्यक्तित्व में क्या परिवर्तन है यह तो स्वयं ही तय करना थोड़ा अटपटा लगता है और सही है भी नहीं। पर हाँ! इतना जरूर कह सकती हूँ कि बहुत सकारात्मक व्यक्तियों के सम्पर्क में आयी, यह सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि है योरकोट व लेखन से।लोगों के साथ जुड़ना और सीखना, इसका पूरा श्रेय मैं योरकोट को ही देती हूँ और आजीवन आभारी रहूँगी क्योंकि इस पटल से बहुमूल्य रत्नों की प्राप्ति हुयी है।

दिनचर्या….उफ्फ.!! इस सवाल का जवाब देने में रोम रोम काँप रहा है मेरा…कह रहा है मुझसे कि सच कहा तो सब मटियामेट हो जाना है और झूठ कहना बिल्कुल अनुचित!फिर भी कह ही देती हूँ कि योरकोट, फेसबुक, इंस्टाग्राम,यूट्यूब, व्हाट्सऐप, हाइक, यहाँ तक कि हैंगआउट्स भी…और न जाने क्या क्या…मिलकर जान ले लेते हैं बच्ची की! फिर भी सब डामाडोल चलता है….और मोबाइल मिल जाए अगर किसी को मेरा गलती से भी तो हत्या तय है इसकी…! अलग ही पहचान बना दी है मेरी इस डिवाइस ने,बाकी मैं तो हूँ ही नींघस….सुनो सबकी…करो मन की!

बढ़िया है बहुत बढिया है मोबाइल तो आजकल सबको चर रहा ही है ।कोई ऐसी वस्तु जो आपके जो आपके दिल के बेहद करीब हो या आपकी सबसे पसंदीदा हो अगर आप सहज हों तो उसकी एक तस्वीर हम सबसे साझा करें हमें बेहद ख़ुशी होगी और हो सके तो उसके बारे में भी कुछ बताएं यानी आपका उससे इतना गहरा लगाव क्यों है और कब हुआ ?इत्यादि ।

चश्मसाहब!दिनचर्या बची नहीं और आप कह रहे बढ़िया है,वाह!! वस्तुओं का क्या है…नश्वर हैं।आपका भाग्यही होगा जो आपको उनसे जोड़कर रखता है या उनसे आपका भाग्य ! मैंजो साझा करने जा रही हूँ, वो न ही मेरा भाग्य है और न मैं उसका।बस इतनी सी बात है कि उससे एक सकारात्मक बदलाव आया ज़िंदगी और जीने के नजरिये में।ज्यादा वक्त न लेते हुए,वो प्रिय वस्तु कुछ और नहीं तीन किताबें हैं और तीनों ही स्वामी विवेकानंदजी की-

1-सफलता के सोपान

2- व्यक्तित्वका विकास

3- The Way To Woman’s Freedom

बात वर्ष 2014 की है जब मैं स्नातक पूरा करके विश्वविद्यालय और अपने मित्रों से विदा ले रही थी, मेरी सबसे प्रिय मित्र कात्यायनी तिवारी ( ज़िक्र ऊपर भी है)ने मुझे यह तीन किताबें दी थीं पढ़ने के लिए क्योंकि यह उसे बहुत पसंद आयी थी।अब किताब तो होती ही है पढ़नेके लिए पर मैंने इसलिए कहा क्योंकि तब मुझे पढ़ने की आदत नहींथी।

इसलिए ही किताबें अज़ीज़ हो गयी मेरी क्योंकि इन्होंने मुझे सिखाया कि पढ़ना एक आदत है और आदत ही नहीं वरन बहुत अच्छी आदत है।फिर परिवारके बाद सबसे प्रियसे मिलना भी इसे और भी खास बनाता है।

सत्य है पढ़ना आदत है और लिखना जिज्ञासा का प्रस्फुटन।ये रही लिखने पढ़ने की बात ,आपके जीवन में अब तक आपके लिए खुद में सबसे बड़ी खोज क्या रही ?

हाँ जी! मैं समझ नहीं पा रही हूँ कि इतनी समझदार मैं पहले से थी या अभी-अभी हुई हूँ। आप तो ‘अनुभव’ हैं तो थोड़ा तजुर्बा इधर भी बाँट दीजिएगा फुरसत में। इतनी सीरियस बातें कौन करता है भला! चार लोग, चार दीवारें, और चार ही दिन हैं ज़िंदगी के….ज़िंदादिली से बिता लेते है। रोना धोना सीरियस होना अगले जनम पर छोड़ते हैं (हालाँकि यह कोरी कल्पना लगती है मुझे)। खोज का तो हिसाब-किताब मेरे बस का है ही नहीं क्योंकि यह वैसा है जैसे आप इण्टरमीडिएट के छात्र से पूछें कि ‘इसरो’ में किस विषय पर शोध किया और क्या परिणाम रहा। साहब फलसफा बड़ा कठिन है और मैंने तो रास्ते ढूंढ़ने शुरू किए हैं, बने तक न हैं अब तलक! मौजूदा हालात में खोज तो नहीं मगर सीख जरूर पायी हूँ कुछ और अपनाने का भी पूरा प्रयास रहता है। कुछ इस तरह से हैं पंक्तियाँ कि,

साक्षात प्रमाण ही है ये, मेरी व्यक्तिगत विक्षिप्तता के;

भौंकना मुझे भाता नहीं और बधिर हुई हूँ हथिनी जैसे।” ©

बस यही छोटा सा किस्सा सीख पायी हूँ और आत्मसात करने का प्रयास रहता है, डगमगा भी जाती हूँ कभी-कभी!नाम का असर हावी हो जाता है….!

चलिए उम्मीद है आप इसी तरह सीखती , पढ़ती और लिखती रहेंगी । तहेदिल से आपका आभार इस साक्षात्कार के लिए और मुझे झेलने के लिए भी। कोई बात जो आप सभी लेखकों से कहना चाहे।

अनुभव जी धन्यवाद आपका जो आपने समय, समर्थन व सम्मान दिया! इस पटल की मैं सदैव आभारी रहूँगी जो मुझे अग्रज, अनुज और मित्रों का सहयोग, स्नेह और मार्गदर्शन मिला। समस्त परिवारजनों को मेरी ओर से ससम्मान असीम स्नेहिल आभार समर्पित है।
 मैं स्वयं भी सीख ही रही हूँ तो किसी को भी सलाह देने का औचित्य नहीं है फिर भी जितना मुझे प्रेरणा मिली है उसके अनुरूप अधिकाधिक पठन से ही लेखन में सुधार संभव है क्योंकि वृहद विचारों की पोटली होना ही मूल है सम्भवतः लेखन का। आप सब भी ज्यादा से ज्यादा पढ़िए और ज्यादा से ज्यादा लिखिए भी ताकि मुझ जैसे बहुत लोग सीखते रहें और मार्गदर्शन करते रहिए । खुश रहिए और दिल से लिखिए….भले ही वो दर्द हो, प्रेम हो, सामाजिक मुद्दे हों, सच हो, झूठ हो…कुछ भी हो बस दिल से लिखिए, ज्यादा असरदार होता है( ऐसा मेरा मानना है, आपका अपना नज़रिया हो सकता है)!

चश्म जी को भी यह कहना चाहूँगी कि आपकी विधा स्वयं में ही विस्तृत रूप लिए हुए है और आप भी की लोगों की प्रेरणा हैं। आप उम्र में भले ही छोटे हैं मुझसे पर ओहदा आपका बहुत ऊँचा है और उसके लिएआपको बहुत सम्मान व ढेरों शुभकामनाएँ हृदय से।
 पुनः सभी को सादर वंदन और धन्यवाद मुझे अपनी जद्दोजहद वाली दिनचर्या के कुछ कीमती मिनट तोहफे में देने के लिए!

ये रही तल्ख़ साहिबा की कुछ बेहतरीन कारीगरी

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